आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है. बनता था की इतनी उभरती आवाज़ों में मेरी अपनी आवाज़ भी हो. सुबह से बहुत सारे विज्ञापन, फॉरवर्ड्स , मैसेजेस चल रहे है. किसी ने कोई कमी नहीं छोड़ी. आज सब अपनी तरफ से याद दिल रहे है की महिला जागृती की कितनी अहम भूमिका है उनकी ज़िन्दगी में. अच्छा लगता है जब एक दिन अचानक ही सब बहुत सचेत हो जाते है नारी की उपलब्धियों को लेकर। सबको याद आता है अपनी माँ बहन बेटी बीवी का योगदान.
मेरी सिर्फ एक प्राथना है. ना सिर्फ पुरुषों से जो धड़ाधड़ महिलाओं को नमन करते हुए मैसेजेस करते है बल्कि उन महिलाओं से भी ( जिसमें मैं भी शामिल हूँ) की बाकि ३६४ दिन भी महिलाओं के होते है. हर रोज़ मेरा आपका सबका होता है. आज कुछ अलग़ नहीं था. आज भी मैंने ऑफिस का काम किया, घर के काम निपटाये. बच्चो की पढ़ाई ध्यान दिया. और आज भी, हर रोज की तरह आने वाले कल के सपने देखे.
लेकिन यह तो हुई मेरी आपकी सामान्य घरों की बात. असली असर महिला दिवस का तब दीखता है जब World Bank Zika virus से त्रसित महिलाओं के लिए कारगर कदम उठाते है। या फिर ICICI जैसे महिला दिवस पर 'वर्क फ्रॉम होम' कार्यक्रम का आरम्भ किया जिसके अंतर्गत महिलाएं एक साल तक घर से काम कर सकती है समय पड़ने पर जिससे महिलायें ज्यादा समय तक काम कर सके.
कुछ भी कहें महिला दिवस हम सबको महिलाओं के प्रति एक जवाबदेही या फिर उत्तरदायित्व की भावना तो ला ही देता है. आज का दिन सामान्य बीता. महिला दिवस या कोई आम दिन मैं वैसे ही अपने बच्चों को पढ़ाउंगी, वैसे ही जैसे कोई और दिन. बस आज का दिन थोड़ा खास इसलिए था की शायद मुझे मेरी एक बहुत पुरानी सहयोगी ने फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज कर महिला दिवस का अभिनन्दन भेजा. अच्छा लगा. धन्यवाद शुक्ला दास मैम।
अंत में आप सभी को मेरी ओर से हार्दिक अभिनन्दन, आज की, आने वाले कल की और हर उस दिवस की जिसमें महिलाओं को खुशियाँ मिले.
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