Thursday, December 21, 2017

लेखन और लेखनी

लिखना मुश्किल नहीं होता।  मुश्किल होता है वह समय जब आप लिखना चाहते है और आपके सामने दस काम और है।  अच्छा लगता है मुझे अपने विचारों को आवाज़ देना।  लेकिन यह नहीं जानती की मेरा दिमाग जिन विचारों को व्यक्त करता है क्या वह किसी और के ज़हन को समझ में भी आते है।  अक्सर मेरे दोस्त यह  कहते थे, नूपुर तुम्हारी बातें समझ में नहीं आती है, जो थोड़े  विनीत है वह मज़ाक में पागल कह देते है और जो थोड़े अक्खड़ है वह तो देखा अनदेखा कर देते है।

लेखनी ही ऐसा माध्यम है जिससे मैं अपने को अपने तरह से व्यक्त कर सकती हूँ, शायद।  लेखिका बनाना मेरा सपना कभी नहीं था।  स्कूल में जब निबंध लेखन या कहानी लेखन आता तो मैं अपनी तरफ से बहुत अच्छा लिखती, पर शायद टीचर को मुझसे अपेक्षा ज़्यादा थी।  आख़िरकार बाबा  मेरे हिंदी के जाने माने उपन्यासकार जो थे।  माता पिता हिंदी के ज्ञाता थे।  अपेक्षा सही थी या शायद नहीं थी।

आज जब लिखती हूँ तो मानो पंख से लग जाते है।  सिर्फ दो भाषाओँ का ज्ञान है।  हिंदी और अंग्रेजी।  इसलिए कोशिश पूरी रहती है की दोनों में लिखूँ।

लेखनी एक माध्यम है जो आपको अपने आप से मिलाता है।  कई बार दुनिया में पहचान बनाता है।  मैं अक्सर सोचती हूँ, क्यों लिखती हूँ मैं, क्या मिलता है मुझे, कौन पढता है है इसे, लेकिन शायद अपने लिए लिखने का एहसास ही इसे कुछ खास बनाता है।

मुद्दा यह नहीं है की आप लिखना चाहते है, मुद्दा यह है की आप कितना स्वत्रंत रूप से अपने को अभिवक्यत कर सकते है।  या फिर शायद कितनी निडरता से।  जब लिखना शुरू किया तो  बस लिखने के लिए लिखती थी।  एक अभीव्यक्ति के लिए।  धीरे धीरे अपने दोस्तों को दिया पढ़ने।  कुछ ने पढ़ा बहुतो ने नकार दिया पर फिर कुछ ने सराहा।  भाषा बेहतर हुई, सन्दर्भ भी  और अब वेग भी।  कुछ नहीं ठीक हुआ है तो तो लिखने का नियममिता। वह भी आ जाएगी , बस अपने को कहती हूँ , एक समय पर एक कदम और रास्ता पार हो जायेगा।