Monday, June 27, 2016

मेरे सास ससुर



किसी ने सही कहा था. जब बड़े होगे तब आटे दाल का भाव पता चलेगा. मुझे इस बात की संतुष्टि है की आज तक आटे दाल का भाव  उतनी अच्छी तरह भी नहीं जानती. हाँ, स्वाद चखा ज़रूर था जब कुछ दिन के लिए अकेले रहते थे. लेकिन फिर ससुराल में ज़रूरत नहीं पड़ी. मम्मी पापा सब देख लेते है. अभी तक  छुटपन से निकले नहीं. सब्जी लेनी है. मम्मी को बोल दो. यहाँ    तक की क्या बनेगा उसका बीड़ा भी मम्मी ने उठाया है। 

कितनी आसान होती है वह ज़िन्दगी जब आपके ऊपर बड़ों का साया हो. मेरे बच्चे कैसे पल गए मुझे पता नहीं चला. बस कुछ चाहिए था. पापा थे. मम्मी थी. गड़बड़ की तो थोड़ी डाँट पड़ी. फिर सब  वैसे ही. मेरा करियर और उस दौरान मेरी पढाई, सब कुछ उनके आशीर्वाद से. यहाँ तक की मेरे पापा आज भी मेरी पार्किंग की जगह और किसी को गाड़ी नहीं खड़ी करने देते जब तक मैं न आ जाऊ। 

शायद यही सरलता उनको सबसे अलग. सबसे खास बनाती है।  पापा मेरे लिए मेरे पसंद की जलेबी ले कर आते थे. मुँह से निकली कोई चीज़ पूरी न हो ऐसा याद नहीं।  ऐसा नहीं है शिकायतें नहीं है, पर शायद वही है जो मैं अपने मम्मी पापा से करती।  

कहते है कुछ लोग प्यार दिखाते नहीं करते है।  मेरा ससुराल भी ऐसा है। यहाँ प्यार का दिखावा नहीं होता।  

Saturday, June 11, 2016

मेरे पापा - ' मेरी हसीं'



आज मैंने अपने बेटे से पुछा किसकी कहानी लिखू।  मेरे बेटे ने झट से कहा नाना की।  मेरे चेहरे का कौतुहल देख कर बोला आपने नानी के बारे में तो लिख दिया और नाना।  मेरा ९ साल का बेटा कब इतना बड़ा हो गया पर शायद पापा होते तो ताना वह भी यही देते।  तो जैसे की मैंने पहले भी लिखा था।   घर में हम चार लोग थे।  पापा, मम्मी, दीदी और मैं।  और मैं पापा की लाड़ली थी।  तो कभी भी कुछ बात का फैसला होना होता था, पापा और मैं एक पार्टी में होते थे और मम्मी और दीदी दूसरी।  और तो और पापा के सुबह सुबह के गाने।  उफ़।  बाकि मम्मी पापा अपने बच्चों को सुबह उठाने की कोशिश करते थे और मुझे याद है की छुट्टी वाले दिन अगर मैं गलती से ६ बजे उठ गयी तो पापा जो अक्सर उस समय तक उठ जाया करते थे और दिन की पहली चाय  खुद बन कर पीते थे वह मुझे सुला देते थे।  और गलती से ८ बजे के बाद तक सो  गए  तो शामत।

मेरे दोस्तों के दोस्त, अपने दोस्तों के दोस्त, और समय  पाबन्दी इतनी की बनारस जाने के लिए काशी विश्वनाथ ट्रैन भले ही दोपहर २ बजे की जगह शाम के ५ बजे छूटे लेकिन हम दोपहर के १२ बजे तक स्टेशन पर हाज़िर।  काफी किस्मतवाली थी मैं।  मेरे हिस्से की डांट भी दीदी या मम्मी खाते थे।  कॉलेज से Trade Fair देखने मैं गयी और जब तक घर नहीं आई तब तक मम्मी ने डांट खायी।  घर के अंदर आते ही सब शांत।

  मेरे सबसे अच्छे फ्रेंड थे पापा।  कॉलेज से आ कर उनको चाय बना कर देना और एक सैंडविच।  घंटो अपने फ्रेंड के साथ एक ही कमरे में बिना बातें किये बैठे अपना काम करते हुए भी देखा है।  शायद उन दोनों को यह पता था की दुसरे का कमरे में होना ही बहोत है।

लिखने को पापा के बारे में इतना कुछ है की एक ब्लॉग काम पड़ेगा...

यह पोस्ट शायद मैंने काफी पहले लिखा था।  आज जब पढ़ा तो हस पड़ी।   अपनी यादें पढ़ कर शायद आप खुद इतना भाव विभोर हो जाते हो की  शायद भूल ही गयी मैं की मैंने लिखना शुरू क्यों किया था।   बस इतना  पापा की याद ताज़ा रखनी थी ज़हन में।  बस इतना ही..


प्यार

प्यार हमेशा अधूरा होता है।  कभी पूरा नहीं होता।  कभी  काफी नहीं पड़ता। देने वाला देते देते थक जाये लेकिन लेने वाला कभी नहीं थकेगा।  और शायद इसलिए प्यार इतनी मुश्किल से मिलता है।  

किसी ने पसंद और प्यार की परिभाषा बहुत उम्दा तरीके से समझायी। पसंद वह जो आपके दिल को छू जाये और प्यार वह जो आपका हिस्सा बन जाये।  कल जब मेरे बेटे ने मुझसे कहा की मुझे कोई प्यार नहीं  करता, तो मैंने उसको उसके  पैदाईश की बात बताई जब रात में उसके मम्मा- बाबा , नाना- नानी , काकू (चाचा), गोगी (मौसी) सब उससे मिलने आये। बस इतनी सी बात ने उसकी सोच बदल दी।  या कम से कम शुरआत कर दी।

बच्चे आसानी से मान जाते है।  या शायद उनके पास इतना समय ही नहीं होता की वह ज्यादा सोचेंगे।  हाँ यह ज़रूर है की अक्सर हम बड़े भी इसी जद्दोजहत में  है  की दुसरे हमें  पसंद कैसे करें या प्यार कैसे  करे।  और जब दूसरे हमें  हमारे  हिसाब से नहीं देखते तो हमें दुःख है।  हम वह सारे वादे कसमे गिनने लगते है तो शायद हमने कभी किये थे या कहे थे।

प्यार को बिना किसी कसौटी पर नापे अगर हम दे सके तो उससे पाक भावना कोई नहीं होगी।