किसी ने सही कहा था. जब बड़े होगे तब आटे दाल का भाव पता चलेगा. मुझे इस बात की संतुष्टि है की आज तक आटे दाल का भाव उतनी अच्छी तरह भी नहीं जानती. हाँ, स्वाद चखा ज़रूर था जब कुछ दिन के लिए अकेले रहते थे. लेकिन फिर ससुराल में ज़रूरत नहीं पड़ी. मम्मी पापा सब देख लेते है. अभी तक छुटपन से निकले नहीं. सब्जी लेनी है. मम्मी को बोल दो. यहाँ तक की क्या बनेगा उसका बीड़ा भी मम्मी ने उठाया है।
कितनी आसान होती है वह ज़िन्दगी जब आपके ऊपर बड़ों का साया हो. मेरे बच्चे कैसे पल गए मुझे पता नहीं चला. बस कुछ चाहिए था. पापा थे. मम्मी थी. गड़बड़ की तो थोड़ी डाँट पड़ी. फिर सब वैसे ही. मेरा करियर और उस दौरान मेरी पढाई, सब कुछ उनके आशीर्वाद से. यहाँ तक की मेरे पापा आज भी मेरी पार्किंग की जगह और किसी को गाड़ी नहीं खड़ी करने देते जब तक मैं न आ जाऊ।
शायद यही सरलता उनको सबसे अलग. सबसे खास बनाती है। पापा मेरे लिए मेरे पसंद की जलेबी ले कर आते थे. मुँह से निकली कोई चीज़ पूरी न हो ऐसा याद नहीं। ऐसा नहीं है शिकायतें नहीं है, पर शायद वही है जो मैं अपने मम्मी पापा से करती।
कहते है कुछ लोग प्यार दिखाते नहीं करते है। मेरा ससुराल भी ऐसा है। यहाँ प्यार का दिखावा नहीं होता।
