मम्मी की तबियत ज़्यादा ख़राब होने की खबर जैसे ही गांव तक पहुंची देखने आने वालों ने फ़ोन की झड़ी लगा दी। किसी तरह पापा ने समझा के, थोड़ा डांट के , थोड़ा मना के किसी तरह उन्हें रोका। पापा और दीदी को बात करते सुना तो थोड़ा तो मैं भी घबराई। पूरा कुनबा आने को तैयार था। और पापा की परेशानी यह की आ तो जाये पर तीमारदारी कैसे होगी। मम्मी को देखेंगे की मेहमानो को। एक बार तो अपनी ननद से थोड़ी ान बन भी हो गयी। मुझे लगा कर लुंगी। जहाँ इतना कर रही हूँ कुछ और लोगों का ध्यान नहीं रख पाऊँगी। शायद और कुछ नहीं अपने को prove करना था। फिर दीदी ने समझाया, नूपुर तुम नहीं जानती हो। जो लोग गांव से आएंगे वह तुम्हारे हिसाब से नहीं चलेंगे। तुम्हे उनके हिसाब से चलना पड़ेगा। मुझे कोई खास experience तो था नहीं। अपनी और देवर की शादी में ही देखा था और तब मम्मी ने कमान संभाली थी। पर आज मम्मी बिस्तर पर थी।
और तभी खबर आयी, बुआ सास नयी दिल्ली स्टेशन पर है। घर का पता नहीं मालूम। किसी भलेमानुस ने अपने phone से पापा का नंबर मिलाया और 753 बस नंबर पर बैठा दिया। बुआ सास कुछ ८०- ८२ साल की होंगी और उनके बेटे यानि की हमारे बड़े भाई साहब जो खुद दिल्ली की सड़को से नावाकिफ थे कुछ ६०-६५ के होंगे। राम जाने कौन किसको संभाल रहा था। खैर जैसे तैसे बुआ हमारी घर पहोची।
अब बुआ के बारे में क्या कहा जाये। प्याज़ लहसुन से उनको सख्त परहेज़ है। हमारे घर में किसी भी चीज़ पर चाक़ू नहीं लगना चाहिए। मेरे इलावा उनका खाना कोई बना नहीं सकता। और पानी वह नल का पियेंगी बोतल का नहीं. अपने घर से दूध रोटी खाकर चली थी, एक दिन पहले कुछ १२ बजे दिन में, अगले दिन रात में ८ बजे हमारे घर आकर चाय का प्याला पिया जो मैंने बनाया। वजन शायद ३० किलो से ज़्यादा नहीं होगा, और हिम्मत और फुर्ती इतनी की इतनी उम्र में मेरे बच्चों को मात दे दे। उनको बस मम्मी को देखना था। अपनी आँखों से। और कुछ नहीं। सबसे छुप कर आयी, बेटे को भी जैसे तैसे साथ लिया। आते ही पापा की डांट सुनी। यूँ तो पापा से बड़ी थी पर उनकी सेहत की चिंता पापा को कितनी थी इसका अच्छे से एहसास था।
पापा को भरत बुलाती थी और मम्मी और मुझे दुल्हिन। रात में चार बार जा कर मम्मी को देखती थी। अपनी तस्सली के लिए। फिर कई बार ऊपर आ कर चाय की गुहार लगाती।
कहते है की सेवा का मेवा सबको नहीं मिलता, अगर आपको मिला है तो भरपूर लाभ उठाइये। सेवा तो हमसे हो जाती थी, पर घर के बड़े बूढ़े सेवा की साथ साथ आपके समय, आप से बात चीत करने के भी कायल रहते है, और बात मानिये वह हमसे न हो पाया।
मेरी सास समझ गयी इस बात को की बुआ को कोई सुनने वाला चाहिए और मैं बात करना तो दूर ज़रूरत से ज़्यादा बैठ जाऊ तो मेरे आफत है। मेरी बड़ी ननद ने कहा की बस , अपनी बात कहना चाहती है सुन लेना। थोड़ा बहुत तो मैंने सुना पर फिर उनके पास कहने के लिए बहोत कुछ था और मेरे पास इतना संयम नहीं था. बहरहाल इस कहा सुनी में भाषा ने भी गज़ब साथ दिया मेरा। उनकी भाषा मैं नहीं समझती थी और मेरी वह।
लेकिन मैंने बुआ से बहोत सीखा। ४ दिन के समय में मानो दुनिया भर की सीख दे दी।
मम्मी को कहती थी - जब तक बताओगी की नहीं जानेगी कैसे।
मुझे कहती थी - मैं आती नहींतो क्या तुम्हारे बच्चे मुझे जानते।
बहोत सी बातें अलग थी। लेकिन मन में प्यार भरा हुआ। बहुत प्यारी है हमारी बुआ। थोड़ी न्यारी है हमारी बुआ।
और तभी खबर आयी, बुआ सास नयी दिल्ली स्टेशन पर है। घर का पता नहीं मालूम। किसी भलेमानुस ने अपने phone से पापा का नंबर मिलाया और 753 बस नंबर पर बैठा दिया। बुआ सास कुछ ८०- ८२ साल की होंगी और उनके बेटे यानि की हमारे बड़े भाई साहब जो खुद दिल्ली की सड़को से नावाकिफ थे कुछ ६०-६५ के होंगे। राम जाने कौन किसको संभाल रहा था। खैर जैसे तैसे बुआ हमारी घर पहोची।अब बुआ के बारे में क्या कहा जाये। प्याज़ लहसुन से उनको सख्त परहेज़ है। हमारे घर में किसी भी चीज़ पर चाक़ू नहीं लगना चाहिए। मेरे इलावा उनका खाना कोई बना नहीं सकता। और पानी वह नल का पियेंगी बोतल का नहीं. अपने घर से दूध रोटी खाकर चली थी, एक दिन पहले कुछ १२ बजे दिन में, अगले दिन रात में ८ बजे हमारे घर आकर चाय का प्याला पिया जो मैंने बनाया। वजन शायद ३० किलो से ज़्यादा नहीं होगा, और हिम्मत और फुर्ती इतनी की इतनी उम्र में मेरे बच्चों को मात दे दे। उनको बस मम्मी को देखना था। अपनी आँखों से। और कुछ नहीं। सबसे छुप कर आयी, बेटे को भी जैसे तैसे साथ लिया। आते ही पापा की डांट सुनी। यूँ तो पापा से बड़ी थी पर उनकी सेहत की चिंता पापा को कितनी थी इसका अच्छे से एहसास था।
पापा को भरत बुलाती थी और मम्मी और मुझे दुल्हिन। रात में चार बार जा कर मम्मी को देखती थी। अपनी तस्सली के लिए। फिर कई बार ऊपर आ कर चाय की गुहार लगाती।
कहते है की सेवा का मेवा सबको नहीं मिलता, अगर आपको मिला है तो भरपूर लाभ उठाइये। सेवा तो हमसे हो जाती थी, पर घर के बड़े बूढ़े सेवा की साथ साथ आपके समय, आप से बात चीत करने के भी कायल रहते है, और बात मानिये वह हमसे न हो पाया।
मेरी सास समझ गयी इस बात को की बुआ को कोई सुनने वाला चाहिए और मैं बात करना तो दूर ज़रूरत से ज़्यादा बैठ जाऊ तो मेरे आफत है। मेरी बड़ी ननद ने कहा की बस , अपनी बात कहना चाहती है सुन लेना। थोड़ा बहुत तो मैंने सुना पर फिर उनके पास कहने के लिए बहोत कुछ था और मेरे पास इतना संयम नहीं था. बहरहाल इस कहा सुनी में भाषा ने भी गज़ब साथ दिया मेरा। उनकी भाषा मैं नहीं समझती थी और मेरी वह।
लेकिन मैंने बुआ से बहोत सीखा। ४ दिन के समय में मानो दुनिया भर की सीख दे दी। मम्मी को कहती थी - जब तक बताओगी की नहीं जानेगी कैसे।
मुझे कहती थी - मैं आती नहींतो क्या तुम्हारे बच्चे मुझे जानते।
बहोत सी बातें अलग थी। लेकिन मन में प्यार भरा हुआ। बहुत प्यारी है हमारी बुआ। थोड़ी न्यारी है हमारी बुआ।