Friday, January 22, 2016

विरासत

हमारी कोई विरासत है या नहीं यह घर या मकान के कागज़ात तय नहीं करते. बल्कि आप अपनी किसी छाप अपने पीछे छोड़ जाते हो यह बताता है. आपकी छाप आपके छात्रों के दिलो में, आपके बनाये हुए चटनी के स्वाद में या फिर सिर्फ आपकी पीछे छोड़ी हुई हसी में. कहीं भी मिल सकती है.

किसी ने सही ही कहा है, वो बनो जो याद तुम अपने पीछे छोड़ना चाहोगे. बहुत मुश्किल है वह याद बनाना. हम चाहते तो है की सब हमको एक अच्छे इंसान के नाम से याद रखे लेकिन सबसे बड़ी चुनौती आती है की आप एक साँचे में ढले नहीं रहते.

बल्कि सच पूछो तो साँचा ही हमेशा बदलता रहता हैकभी समाज के बढ़ते घटते दायरों की वजह से और कभी हमारी अपनी अपेक्षाओं की वजह से. कारण जो भी हो हमारी विरासत हमारी उस सांचे में ढलने या फिर उस साँचे को अपने हिसाब से ढालने परिपक्वता पर निभर करता है.

 लेकिन उसमें भी कुछ लोग अपनी विरासत को इतना मज़बूत बनाते है  की कोई भी सामाजिक ढांचा बदल नहीं सकता. इसका कारण यह है की वो लोग अपनी नीव अपने मूल्यों में, अपनी नीतियों में और बदलते समाज के साथ बदलते समय को अपनाते हुए बदलते हुए सच पर विश्वास रखते है.

हमको रोजमराह के जीवन में ऐसे हज़ारों उदाहरण मिल जाते है जो साँचे अपने हिसाब से बदलते है ताकि उनकी याद उनके जाने के बाद भी लोगों के ज़हन में रहे.


Saturday, January 16, 2016

मेरी माँ

हमारे परिवार में मैं जो सबसे छोटी थी, मेरी बड़ी  बहन,   माँ और पापा थे. माँ ने एक माहोल बनाया था जिसमें हम लोग दोस्त ज्यादा और बड़े छोटे कम थे. बात करना  आसान था. बहुत आसान. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था. मुझे अभी भी वह वाक्या याद है जिसके बाद मुझे लगा था की मैं मम्मी के पास जा कर कुछ भी कह सकती हूँ.
 क्लास याद नहीं. नया नया बचपना था. कुछ दोस्तों ने मिल कर बदमाशी की और फिर पकडे जाने के डर से तय किया की अपने अपने घर में नहीं बताइएंगे.  लेकिन मेरा चेहरा धोखा दे गया. घर आई और सब बोल दिया. मम्मी ने कुछ नहीं कहा. बस इतना की आगे से कभी मन   घबराये तो मुझसे आ कर बात कर लेना.

वो दिन और जिस दिन तक माँ थी, शायद कभी ज़रूरत नहीं पड़ी उनसे कुछ छुपाने की

आज मेरे दो   बच्चे है। मैं चाहती हूँ की वो दोनों भी उसी तरह मुझसे हर बात करें.   यह कैसे होगा मैं नहीं जानती. जो धैर्य और बड़प्पन मेरी माँ में था वह पता नहीं मुझे है भी या नही. उनकी सबसे बड़ी खासियत थी उनका बड़ा दिल. सबके लिए प्यार था. कई बार तो हम लोग परेशान हो जाते. बचपना भी कूट कूट के भरा था. शायद यही उनको सबसे अलग बनाता था.

आज जब माँ को गए हुए कुछ ६ साल हो गए है तो मन उनकी याद  ज़रूर करता है पर फिर सोचता है की शायद भगवान  को भी ऐसे लोगो की ज़रूरत पड़ती होगी.

मस्त थी मेरी माँ. कोशिश करुँगी उनकी और कहानिया उनके students के माध्यम से लाने की. शायद  याद को वापस संजो पाऊ.

आज अगर उनका कोई भी स्टूडेंट उनकी खट्टी मीठी यादें किसी फोटो या लेखन के माध्यम से मुझसे शेयर करना चाहता है तो मुझे मेरे फेसबूक पर या फिर nupur@facilitatingexcellence.com पर लिखे.

Tuesday, January 12, 2016

मेरा पहला प्यार...



     कैरियर  की शुरआत काफी मज़ेदार थी. बचपन से समाज सेवा का कीड़ा था. स्कूल में ५ साल तक लगातार SUPW में सोशल वर्क लेने के बाद ११वी स्कूल वालों ने ज़बरदस्ती दूसरा सब्जेक्ट दिलवाया. लेकिन तब तक एक सनक सवार हो चुकी थी. सबसे मस्त तो माँ का उलाहना था. पहले घर में सेवा करो फिर समाज की करना.

कॉलेज आते जाते रस्ते में नयी बिल्डिंग देखी। थोड़ा पता किया तो पता चला की एक समाज सेवी संस्था है. फिर क्या था. चल पड़े कॉलेज की परीक्षा के बाद. एक सभ्य सी महिला आई और अपना परिचय Mrs रामचंद्रन के नाम से  दिया. कुछ सोच के नहीं गयी थी. सोचा था देखते है क्या मिलेगा. एक प्रोजेक्ट आया था. हेल्थ प्रोजेक्ट. उसी में सर्वे का काम था. एक टेस्ट दिया और बोली इसको करो. अब ओखल में सर डाला तो मूसल से क्या डरना.  जैसे तैसे कर दिया. शायद कुछ सही ही किया होगा. कुछ दिन बाद वहाँ से फ़ोन आया और उन्होंने मिलने के लिए बुलाया.

और हाँ यह सब मैं वालंटियर की तरह सोच कर करने गयी थी. पहला assignment था  एक slum बस्ती जिसको सरकार ने एक जगह से हटाकर दूसरी जगह relocate या विस्थापित किया है उनकी जानकारी कुछ कागज़ के पन्नो पर बटोर कर लाना.

मैं २० साल की थी तब. पर इतनी समझ थी की मैं जिनसे बात करने जा रही हूँ उनको नवंबर की सर्दी में अपना घर छोड़ कर यहाँ पर ले आया गया है. सरकार ने पहले कितनी बार वार्निंग दी नहीं दी, इससे कुछ खास लेना देना नहीं था. जो सच सामने था की एक बसे बसाये घर को हटाकर १२.५ गज ज़मीन दी गयी है. आस पास ना स्कूल है, न अस्पताल और न ही काम का कोई और जरिया.

उस हालात में उनकी ज़िन्दगी को कुछ पन्नो में बंधना, बहुत डराता था मुझे. एक हिचक थी. पर किसी ने सही ही कहा है. लोगों की दिल उनकी मुश्किलों से जुड़े हुए नहीं है. मुझे मेरे पन्नो के जवाब मिले.. लेकिन उससे भी ज़्यादा प्यार मिला.. क्यों , शायद इसका जवाब किसी मनोविज्ञान की किताब में नहीं मिलेगा. लेकिन मैं कुछ सौभाग्यशाली लोगो में से हूँ जिसको लोगो का प्यार मिला. मैंने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा. एक राह बनायीं जिसने किसी न किसी तरीके से मुझे लोगो से जोड़ कर रखा. वो लोग जो बिन मांगे प्यार देते है.

मेरा पहला प्यार...

कुछ लिखू .....

लिखने का शौक बचपन से था. घर में हमेशा से पढ़ने लिखने का माहौल था. बाबा प्रख्यात लेखक थे. पापा भी हिंदी के प्रोफेसर थे. माँ हिंदी की टीचर थी. घर में बात चीत भी हिंदी के मानक लेखन पर होती थी. मैंने जब लिखना शुरू किया तो भाषा क्या होनी चाहिए इसपर मन में एक कौतुहल था. स्कूल जो इंग्लिश मध्यम था.

जब अपना काम शुरू किया तो लगा की अंग्रेजी ही एक अच्छा माध्यम  है तो अंग्रेजी में लिखा.  कुछ छपा भी. बड़ी ख़ुशी हुई थी. आज जब किसी ने कहा की आप भी लिखिए, एक अपना ब्लॉग बनाइये तो सोचा शुरुआत  मैं हिंदी से ही करुँगी.

बस मन में जो आया वह लिखूंगी.. अपनी कलम को आवाज़ दूंगी.