Saturday, March 3, 2018

डर का मंज़र

डर एक वह पैंतरा जिससे आप अच्छे अच्छों की नींद उड़ा सकते है।   क्या है यह डर, क्यों होता है इसका इस्तेमाल।  फेसबुक पर एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आपको परेशां कर सकती है। क्यों, क्यूंकि शायद उसी फेसबुक पर आप अनगिनत बच्चों के खोने की खबरें देखती और सुनती है।  क्या हमारे माँ बाप भी इतना ही परेशां, इतना ही सहमे रहते होंगे।

पापा की डांट याद है मुझे, मेरे लिए कम दीदी के लिए ज़्यादा होती थी।  पत्रकारिता का बीड़ा जो उठाया था।  पापा ने कभी नहीं रोका।  शायद प्रोत्साहित ही किया, जितना मैंने समझा उनको दीदी पर घमंड था।  सिर्फ फ़र्क़ नहीं.. घमंड।  पर इस घमंड ने भी उनके अंदर के डर को कभी पूरी तरह हराया नहीं।  मैंने ऐसे कोई महान काम नहीं किया इसलिए पापा को कभी भी मेरी तरफ से वह चिंताएं नहीं हुई।  हाँ मेरी समाज सेवा ने कुछ दिनों तक तो नींदें उड़ाई होंगी उनकी भी।

लेकिन अब डर ने एक अलग ही रूप ले लिया है।  पहले डर आपको सचेत करता था लेकिन अब, अब का डर शायद ख़ौफ़ज़दा।  डर ने अलग तस्वीरें ले ली है , कही सीरिया के रोते बिलखते बच्चो की तस्वीर जो खुद आपको शर्मसार कर देते है, और कही अपने ही मुल्क में हवस और नफरत का शिकार होते लोग।  आये दिन खबरें आपको सिर्फ डराती नहीं बल्कि झकझोर देती है।

किसी भी मीडिया पर चाहे प्रिंट हो या इलेट्रॉनिक सोशल हो या और कोई डिजिटल , आपको सिर्फ इस एहसास की ख़ुशी देता है की इस पल आप खुश है और भगवन का शुक्रिया करते है।

क्या करे इस डर का।  क्या इलाज है।  सड़को पर उतरे या घर पर बैठे।   आघात करे या प्रतिघात।  अपने को बचाये या समाज को।  अपने घर में रोक लगाए या समाज का बीड़ा उठाए।  हाँ नहीं जीना मुझे डर में, खौफ में, दहशत में फिर क्यों आज मुझसे मेरा ही समाज सतर्क रहने की गुहार लगा रहा है।  क्यों मैं अपने घर में आने वाले हर शक़्स को एक शंका के दायरे में रखु।

नहीं मुझे नहीं चाहिए ऐसे समझ जहा खुल के सांस लेने के लिए भी मुखोटों की ज़रूरत हो।  क्यों नहीं सीखा पा रही मैं अपने बच्चे को की हर सड़क पर चलने वाला शक़्स खतरा नहीं, हर घर में आने वाला मांगने वाला साधू नहीं।  मेरे बच्चे कब उस समाज में सांस ले सकेंगे जब, वह खुल के खेले और हसे और हमें हसने पर पाबन्दी न लगनी पड़े।


गुजिया का स्वाद।



होली आयी तो गुजिया बनाने का मन किया।  सास से पूछा तो बोली रहने दो, कहाँ परेशां होगी , पति से कहा तो कहते  है छोड़ो क्यों  काम  बढ़ा रही हो।  लेकिन  मेरा मन तो फिर भी था।  सामान मंगवा लिया और कर ली तयारी।  डर के मारे सास को नहीं बताया की डांट पड़ेगी, तुम भी ज़बरदस्ती माथा ख़राब करती हो।

 जब  भी कोई काम करो तो आशा रहती है, की आपको उस काम की शाबाशी मिलेगी लेकिन हमेशा नहीं होता।  ससुराल में तो बिलकुल नहीं।  मेरा गुजिया बनाने का अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा।  पहले तो बच्चों ने किचन में धावा बोल दिया यह कह कर की हम भी मदद करेंगे।  बच्चों की अच्छाई थी की वह मेरी मदद करना चाह रहे थे, लेकिन मैं थक रही थी और उनकी मदद थोड़ा भार  लग रही थी।  थोड़ा काम दे कर किसी तरह उनको बहलाया और फिर किचन सेबाहर किया।

बेटे के exam उसी दिन ख़तम थे तो भाई साहब कतई  सोने के मूड में नहीं थे।  मैंने  रात के एक बजे तक काम निपटाया तो उन्होंने भी मेरा पूरा साथ दिया।  कभी मोबाइल पर गेम खेल कर और कभी मेरे साथ सफाई करवा कर। गुजिया बन कर तैयार हुई तो ज़्यादा किसी को पसंद नहीं आयी।  सास ससुर ने यह कह कर रख दिया की उनसे खायी नहीं जाएगी और पति ने कुछ तो कमी कही थी।  डब्बे में पड़ी वह गुजिया न मेहमान को खिलाई गयी न घर वालो को।

फिर क्या खास था इस बार की गुजिया में।  गुजिया मैंने बनायीं थी क्यूंकि मेरा मन था, प्रसाद की तरह बनायीं थी और मेरे बच्चों ने इस अनुभव का आनंद लिया।

जैसा भी था इस साल की गुजिया का स्वाद मेरा अपना था।