एक और महिला दिवस और फिर मेरे लिखने का कीड़ा उफान पर - नहीं मानती या जानती की मेरा कहना या लिखना किसी दिन का मोहताज है लेकिन मौका ज़रूर है। फिर हैप्पी वुमन डे के ढेरो messages में औरत कभी वीरांगना बनी, कभी मनमौजी, कभी करता धर्ता बनती, कभी दुःख हर्ता, औरत कभी शक्ति बनी, कभी भक्ति। पुरुष सहकर्मियों ने भी कमी नहीं छोड़ी - किसी ने उसे सुन्दर बताया, तो किसी ने महान; कुछ ने तो अपने अधिकारों को ही मुद्दा बना लिया। आखिर क्यों भाई; सिर्फ महिला दिवस ही क्यों; हम पुरुष भी तो कम नहीं है; हमें भी तो दिवस मिलना चाहिए।
बात उठी तो लगी सही है; आखिर क्यों महिला दिवस; पुरुष दिवस नहीं। फिर ध्यान फेसबुक की दो ख़बरों पड़ा ।
"Women are often drugged before their skin is extracted. " यह एक खबर थी जिसमें नेपाल की औरतों की का फायदा उठाया जाता था उनकी त्वचा का व्यापर कर के ताकि कुछ अमीर लोग अपने को और सुन्दर बना सके।
"19 female foetuses were found wrapped in Sangli District of Maharashtra." इसके बारे में कुछ भी कहूँ काफी नहीं होगा।
कोई सवालिया निशान नहीं है यह; महिला दिवस या उन जैसे हज़ारों और दिवसों की ओर लेकिन सिर्फ एक प्रयास है यह चेताने का की शायद यही कारण है की हमें अभी हर दिवस यह एहसास रहना चाहिए, की कहीं कोई भ्रूण सेक्स डटर्मीनेशन के नाम पर या फिर कहीं और कोई महिला अपनी मजबूरी की बलि चढ़ रही है। जब तक हम ऐसी किसी भी ख़बर को उसकी जड़ से ख़तम करने का प्रयास न उठा ले, तब तक हर दिन महिला दिवस मनाइये, याद दिलाइए की कितनी महान है औरते और खूब बढ़ चढ़ कर उनके अधिकारों के, अपने अधिकारों के हनन होने का विरोध करें।
महिलायें महान है; हर दिन वह अपने आप को इस बात के हज़ारों प्रमाण देती है। यह दिन शायद सिर्फ उनके अपने और बाकियों के लिए है- अरे हाँ--- यह जो मैं रोज़ करती आ रही हूँ या तुम रोज़ करती आ रही हो -- आसान नहीं है। . इसके लिए हिम्मत चाहिए।
आप सभी को आप सभी का दिन मुबारक हो।
