Saturday, March 3, 2018

गुजिया का स्वाद।



होली आयी तो गुजिया बनाने का मन किया।  सास से पूछा तो बोली रहने दो, कहाँ परेशां होगी , पति से कहा तो कहते  है छोड़ो क्यों  काम  बढ़ा रही हो।  लेकिन  मेरा मन तो फिर भी था।  सामान मंगवा लिया और कर ली तयारी।  डर के मारे सास को नहीं बताया की डांट पड़ेगी, तुम भी ज़बरदस्ती माथा ख़राब करती हो।

 जब  भी कोई काम करो तो आशा रहती है, की आपको उस काम की शाबाशी मिलेगी लेकिन हमेशा नहीं होता।  ससुराल में तो बिलकुल नहीं।  मेरा गुजिया बनाने का अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा।  पहले तो बच्चों ने किचन में धावा बोल दिया यह कह कर की हम भी मदद करेंगे।  बच्चों की अच्छाई थी की वह मेरी मदद करना चाह रहे थे, लेकिन मैं थक रही थी और उनकी मदद थोड़ा भार  लग रही थी।  थोड़ा काम दे कर किसी तरह उनको बहलाया और फिर किचन सेबाहर किया।

बेटे के exam उसी दिन ख़तम थे तो भाई साहब कतई  सोने के मूड में नहीं थे।  मैंने  रात के एक बजे तक काम निपटाया तो उन्होंने भी मेरा पूरा साथ दिया।  कभी मोबाइल पर गेम खेल कर और कभी मेरे साथ सफाई करवा कर। गुजिया बन कर तैयार हुई तो ज़्यादा किसी को पसंद नहीं आयी।  सास ससुर ने यह कह कर रख दिया की उनसे खायी नहीं जाएगी और पति ने कुछ तो कमी कही थी।  डब्बे में पड़ी वह गुजिया न मेहमान को खिलाई गयी न घर वालो को।

फिर क्या खास था इस बार की गुजिया में।  गुजिया मैंने बनायीं थी क्यूंकि मेरा मन था, प्रसाद की तरह बनायीं थी और मेरे बच्चों ने इस अनुभव का आनंद लिया।

जैसा भी था इस साल की गुजिया का स्वाद मेरा अपना था।

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