किसी ने सही ही कहा है, वो बनो जो याद तुम अपने पीछे छोड़ना चाहोगे. बहुत मुश्किल है वह याद बनाना. हम चाहते तो है की सब हमको एक अच्छे इंसान के नाम से याद रखे लेकिन सबसे बड़ी चुनौती आती है की आप एक साँचे में ढले नहीं रहते.
बल्कि सच पूछो तो साँचा ही हमेशा बदलता रहता है. कभी समाज के बढ़ते घटते दायरों की वजह से और कभी हमारी अपनी अपेक्षाओं की वजह से. कारण जो भी हो हमारी विरासत हमारी उस सांचे में ढलने या फिर उस साँचे को अपने हिसाब से ढालने परिपक्वता पर निभर करता है.
लेकिन उसमें भी कुछ लोग अपनी विरासत को इतना मज़बूत बनाते है की कोई भी सामाजिक ढांचा बदल नहीं सकता. इसका कारण यह है की वो लोग अपनी नीव अपने मूल्यों में, अपनी नीतियों में और बदलते समाज के साथ बदलते समय को अपनाते हुए बदलते हुए सच पर विश्वास रखते है.
हमको रोजमराह के जीवन में ऐसे हज़ारों उदाहरण मिल जाते है जो साँचे अपने हिसाब से बदलते है ताकि उनकी याद उनके जाने के बाद भी लोगों के ज़हन में रहे.
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