क्लास याद नहीं. नया नया बचपना था. कुछ दोस्तों ने मिल कर बदमाशी की और फिर पकडे जाने के डर से तय किया की अपने अपने घर में नहीं बताइएंगे. लेकिन मेरा चेहरा धोखा दे गया. घर आई और सब बोल दिया. मम्मी ने कुछ नहीं कहा. बस इतना की आगे से कभी मन घबराये तो मुझसे आ कर बात कर लेना.
वो दिन और जिस दिन तक माँ थी, शायद कभी ज़रूरत नहीं पड़ी उनसे कुछ छुपाने की
आज मेरे दो बच्चे है। मैं चाहती हूँ की वो दोनों भी उसी तरह मुझसे हर बात करें. यह कैसे होगा मैं नहीं जानती. जो धैर्य और बड़प्पन मेरी माँ में था वह पता नहीं मुझे है भी या नही. उनकी सबसे बड़ी खासियत थी उनका बड़ा दिल. सबके लिए प्यार था. कई बार तो हम लोग परेशान हो जाते. बचपना भी कूट कूट के भरा था. शायद यही उनको सबसे अलग बनाता था.
आज जब माँ को गए हुए कुछ ६ साल हो गए है तो मन उनकी याद ज़रूर करता है पर फिर सोचता है की शायद भगवान को भी ऐसे लोगो की ज़रूरत पड़ती होगी.
मस्त थी मेरी माँ. कोशिश करुँगी उनकी और कहानिया उनके students के माध्यम से लाने की. शायद याद को वापस संजो पाऊ.
आज अगर उनका कोई भी स्टूडेंट उनकी खट्टी मीठी यादें किसी फोटो या लेखन के माध्यम से मुझसे शेयर करना चाहता है तो मुझे मेरे फेसबूक पर या फिर nupur@facilitatingexcellence.com पर लिखे.
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