आज मैंने अपने बेटे से पुछा किसकी कहानी लिखू। मेरे बेटे ने झट से कहा नाना की। मेरे चेहरे का कौतुहल देख कर बोला आपने नानी के बारे में तो लिख दिया और नाना। मेरा ९ साल का बेटा कब इतना बड़ा हो गया पर शायद पापा होते तो ताना वह भी यही देते। तो जैसे की मैंने पहले भी लिखा था। घर में हम चार लोग थे। पापा, मम्मी, दीदी और मैं। और मैं पापा की लाड़ली थी। तो कभी भी कुछ बात का फैसला होना होता था, पापा और मैं एक पार्टी में होते थे और मम्मी और दीदी दूसरी। और तो और पापा के सुबह सुबह के गाने। उफ़। बाकि मम्मी पापा अपने बच्चों को सुबह उठाने की कोशिश करते थे और मुझे याद है की छुट्टी वाले दिन अगर मैं गलती से ६ बजे उठ गयी तो पापा जो अक्सर उस समय तक उठ जाया करते थे और दिन की पहली चाय खुद बन कर पीते थे वह मुझे सुला देते थे। और गलती से ८ बजे के बाद तक सो गए तो शामत।
मेरे दोस्तों के दोस्त, अपने दोस्तों के दोस्त, और समय पाबन्दी इतनी की बनारस जाने के लिए काशी विश्वनाथ ट्रैन भले ही दोपहर २ बजे की जगह शाम के ५ बजे छूटे लेकिन हम दोपहर के १२ बजे तक स्टेशन पर हाज़िर। काफी किस्मतवाली थी मैं। मेरे हिस्से की डांट भी दीदी या मम्मी खाते थे। कॉलेज से Trade Fair देखने मैं गयी और जब तक घर नहीं आई तब तक मम्मी ने डांट खायी। घर के अंदर आते ही सब शांत।
मेरे सबसे अच्छे फ्रेंड थे पापा। कॉलेज से आ कर उनको चाय बना कर देना और एक सैंडविच। घंटो अपने फ्रेंड के साथ एक ही कमरे में बिना बातें किये बैठे अपना काम करते हुए भी देखा है। शायद उन दोनों को यह पता था की दुसरे का कमरे में होना ही बहोत है।
लिखने को पापा के बारे में इतना कुछ है की एक ब्लॉग काम पड़ेगा...
यह पोस्ट शायद मैंने काफी पहले लिखा था। आज जब पढ़ा तो हस पड़ी। अपनी यादें पढ़ कर शायद आप खुद इतना भाव विभोर हो जाते हो की शायद भूल ही गयी मैं की मैंने लिखना शुरू क्यों किया था। बस इतना पापा की याद ताज़ा रखनी थी ज़हन में। बस इतना ही..

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