मुझे टीचर ने बुला कर बोला, अपने बच्चे पर ध्यान दीजिये। बात मानिये अच्छा नहीं लगता है सुनना, बाल मनोविज्ञान धरा का धरा रह जाता है और सारा गुस्सा उस बात से आता है की क्या है ऐसा जो मैं नहीं कर रही। घर आई तो चिल्लम चिल्ली शुरू। बेचारे मेरे बच्चे।
सांस में सांस आयी तो सोचा की भाई देख तो लूँ क्या हो रहा है बच्चों के साथ। निकलवाई कापिया। भाई लाल निशान तो थे. पुछा गया। बेटा जी, मुश्किल कहाँ है? लेकिन तब तक मेरे गुस्से ने अपना असर दिखा दिया था और प्यार मरहम तो दूर, सांत्वना का काम भी नहीं कर रहा था। अब बारी थी बच्चों की गुस्सा निकालने की, तो उन्होंने बात बात पर चिल्लाना शुरू किया, ठीक वैसे ही जैसे मैं उन पर चिल्लाई थी। माँ बनने से पहले बच्चों की परवरिश पर खूब ज्ञान बाटा था मैंने। एक स्वयं सेवी संसथान में कार्यरत थी और वहाँ के नियम बच्चो के प्रति किसी भी दुर्व्यवहार को गलत ही नहीं बल्कि सीधा अपराध घोषित करते थे। कितनी बार बच्चों के साथ काम करने वाले caregivers या टीचर को बुला कर खुद मैंने आड़े हाथ लिया था। अरे क्यों न लूँ। संस्था की policy कहती थी की बच्चे सिर्फ प्यार और मासूमियत के कायल है और उनको वैसे ही प्यार से समझना चाहिए।
पर माँ बनने के बाद मानो सब कुछ बदल गया। जो १० घंटे का प्रवचन था अब वह मेरी जीवन की सच्चाई थी। मैं बहुत नाटकीय नहीं लगना चाहती। पर माँ बनने के बाद पहले कुछ साल तो कोई सीख याद नहीं रहती थी। होता क्या है की मातृत्व आपको एक अलग ही कसौटी पर तौलता है। वह कसौटी नहीं जो दुनिया आपके लिए तय करती है , या फिर आपकी सास, ससुर, पडोसी या आपका परिवेश आपसे कहता है। बल्कि वह कसौटी जिसमें आप हर लम्हा अपने आप से झूझ रहे होते है। आपका हर एक शब्द, हर एक फैसला, हर एक कदम आपके बच्चे के सोचने समझने और भविष्य के फैसले लेने के नीव रख रहा होता है। बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। ऐसा आपको हर पल हर क्षण एहसास होता है चाहे कोई और दिलाये या फिर चाइल्ड साइकोलॉजी के ज्ञान से ओत प्रोत हर तरफ से उमड़ता ज्ञान।
कई बार तो ऐसा लगता है हे भगवन यह क्या किया मैंने, मुझे तो नहीं बताया था Parenting इतनी मुश्कििल होगी। और फिर ठन्डे झोके की तरह आपके बच्चे धीरे से आ कर गले लगते है। आपको प्यार से 'i love you Ma' बोलते है और मन में आता है, "कुछ तो सही कर ही रही हूँगी मैं। "
बच्चों की पढाई, उनका co-curricular performance सब ज़रूरी है, लेकिन मेरा अपना अनुभव कहता है की अभिभावकों के लिए सबसे संतुष्टि की बात यह है की उनका बच्चा खुश है, स्वस्थ्य है और सुरक्षित है। मैंने सीखा है अपने आप को समय रहते यह बताना की कॉपी के लाल निशान गुस्सा तो दिलाते है पर वह सिर्फ वही है कॉपी की निशान। उनको बच्चे तक पहोचने न दूँ यह मेरी ज़िम्मेदारी है।
अपने लिए मेरा यह सीख रही की गलतिया करना चलता है जब तक की मैं उसको आदत न बना लूँ। हमेशा नयी गलतिया करू और पुरानी न दोहराऊ।
बचपन मुश्किल है और जवानी , अधेड़पन और बुढ़ापा भी। ज़िन्दगी एक ही बार जी जाती है तो गलतिया होंगी। सीखते रहिये।।। हर उम्र से।
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