Tuesday, February 13, 2018

मम्मी पापा की याद



माँ पापा को याद करना मुश्किल है।  उनके जाने के इतने साल बाद कई ऐसे लम्हे आते है की आपको अपनी परवरिश की याद आती है।  यह याद आता है की  माँ की हाथ की रोटी और अरहर की दाल का वह स्वाद शायद आज भी आप कहीं ढूंढते है।  लेकिन शायद उससे भी कहीं ज़्यादा याद आता है उन का समझाना।  हमारा वह गुस्सा और माँ का झेल जाना।  आज भी मुझे गुस्सा आता है।  और मेरा परिवार उसे झेलता है।  लेकिन अब अपना गुस्सा  बोोझ लगता है, वही गुस्सा जो माँ के सामने हक था आज बाकि परिवार के सामने कमज़ोरी लगता है।  शायद इसी को कहते है माँ बाप का सुख। 

बहुत जल्दी चले गए ऐसा लगता है।  अभी तो शिकायते  बाकी थी।  अभी तो यह कहना बाकी था की आप ने मेरी उपलप्द्धिया नहीं देखि। कितना कुछ और कहना था।  क्यों कर कुछ लोग इतनी जल्दी चले जाते है।

सबसे बड़ा दुःख की उनकी जगह कोई नहीं ले सकता।  जब मेरे माँ पापा गए कुछ तीन साल के अंतर पर तब मेरे सास ससुर ने बड़ा सहारा दिया।  मुझे लगा शायद भगवान् ने मुझे इन्ही को भेजा है।   पर किसी ने सच ही कहा है।  सास ससुर माँ बाप कभी नहीं बन सकते।  क्यूंकि चाहते हुए भी वह आपको वैसे नहीं अपना सकते जैसे अपने बच्चो को अपनाते है।  और यहाँ मैं मुख्र उनको अपना माने चली थी।  अपनी कमियों पर शमसार होती थी।  लेकिन शायद मेरी आशाएं गलत थी।  उन्होंने मेरे लिए जो किया वह बेटी समझ कर नहीं, इंसानियत के नाते किया।  वाकई बहोत अच्छे लोग है मेरे सास ससुर लकिन वह मेरे मम्मी पापा नहीं है। 

और न ही मैं उनकी बेटी।  आज शायद एक भारी मन से लिख रही हूँ।  ज़िन्दगी से कोई शिकायत नहीं है लेकिन शिकायतों का पुलिंदा रोज़ रोज़ भारी होता जा रही है।  जैसी हूँ जहाँ हूँ ठीक हूँ।  

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