कैरियर की शुरआत काफी मज़ेदार थी. बचपन से समाज सेवा का कीड़ा था. स्कूल में ५ साल तक लगातार SUPW में सोशल वर्क लेने के बाद ११वी स्कूल वालों ने ज़बरदस्ती दूसरा सब्जेक्ट दिलवाया. लेकिन तब तक एक सनक सवार हो चुकी थी. सबसे मस्त तो माँ का उलाहना था. पहले घर में सेवा करो फिर समाज की करना.
कॉलेज आते जाते रस्ते में नयी बिल्डिंग देखी। थोड़ा पता किया तो पता चला की एक समाज सेवी संस्था है. फिर क्या था. चल पड़े कॉलेज की परीक्षा के बाद. एक सभ्य सी महिला आई और अपना परिचय Mrs रामचंद्रन के नाम से दिया. कुछ सोच के नहीं गयी थी. सोचा था देखते है क्या मिलेगा. एक प्रोजेक्ट आया था. हेल्थ प्रोजेक्ट. उसी में सर्वे का काम था. एक टेस्ट दिया और बोली इसको करो. अब ओखल में सर डाला तो मूसल से क्या डरना. जैसे तैसे कर दिया. शायद कुछ सही ही किया होगा. कुछ दिन बाद वहाँ से फ़ोन आया और उन्होंने मिलने के लिए बुलाया.
और हाँ यह सब मैं वालंटियर की तरह सोच कर करने गयी थी. पहला assignment था एक slum बस्ती जिसको सरकार ने एक जगह से हटाकर दूसरी जगह relocate या विस्थापित किया है उनकी जानकारी कुछ कागज़ के पन्नो पर बटोर कर लाना.
मैं २० साल की थी तब. पर इतनी समझ थी की मैं जिनसे बात करने जा रही हूँ उनको नवंबर की सर्दी में अपना घर छोड़ कर यहाँ पर ले आया गया है. सरकार ने पहले कितनी बार वार्निंग दी नहीं दी, इससे कुछ खास लेना देना नहीं था. जो सच सामने था की एक बसे बसाये घर को हटाकर १२.५ गज ज़मीन दी गयी है. आस पास ना स्कूल है, न अस्पताल और न ही काम का कोई और जरिया.
उस हालात में उनकी ज़िन्दगी को कुछ पन्नो में बंधना, बहुत डराता था मुझे. एक हिचक थी. पर किसी ने सही ही कहा है. लोगों की दिल उनकी मुश्किलों से जुड़े हुए नहीं है. मुझे मेरे पन्नो के जवाब मिले.. लेकिन उससे भी ज़्यादा प्यार मिला.. क्यों , शायद इसका जवाब किसी मनोविज्ञान की किताब में नहीं मिलेगा. लेकिन मैं कुछ सौभाग्यशाली लोगो में से हूँ जिसको लोगो का प्यार मिला. मैंने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा. एक राह बनायीं जिसने किसी न किसी तरीके से मुझे लोगो से जोड़ कर रखा. वो लोग जो बिन मांगे प्यार देते है.
मेरा पहला प्यार...
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